तड़कैहें वा सारे घर में झाड़ू लगाती होगी
फेर चूल्हे पै वा बूढे की चाय बनाती होगी !
खेत में जा-कै वा भरौटे नै सिर पै ल्याती होगी
और घर-पै आ-कै वा गंडासे में कटवाती होगी !
थोड़ी हाण पाछै पालणे में बाळक नै थपथपाती होगी
और उसनै सुला कै वा जोहड़ में भैंस न्हुवाती होगी !
भैंस नै घर ल्या कै सान्नी सपान्नी करवाती होगी
फेर सांझ होने पै वा उसकी धार बी कढवाती होगी !
रात नै दूध जमा कै बाळक गैल खाट मैं पड़ जाती होगी
थकी-हारी सोते-सोते ले सटरके, जणूं भैंस अरड़ाती होगी
Thursday, May 1, 2008
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1 comment:
I lyked it, but i thik end is not well of poem..
plz write more...
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