Thursday, May 1, 2008

a poem by a Haryanvi lover

तड़कैहें वा सारे घर में झाड़ू लगाती होगी
फेर चूल्हे पै वा बूढे की चाय बनाती होगी !

खेत में जा-कै वा भरौटे नै सिर पै ल्याती होगी
और घर-पै आ-कै वा गंडासे में कटवाती होगी !

थोड़ी हाण पाछै पालणे में बाळक नै थपथपाती होगी
और उसनै सुला कै वा जोहड़ में भैंस न्हुवाती होगी !

भैंस नै घर ल्या कै सान्नी सपान्नी करवाती होगी
फेर सांझ होने पै वा उसकी धार बी कढवाती होगी !

रात नै दूध जमा कै बाळक गैल खाट मैं पड़ जाती होगी
थकी-हारी सोते-सोते ले सटरके, जणूं भैंस अरड़ाती होगी

1 comment:

Shivansh Jangra Pundri said...

I lyked it, but i thik end is not well of poem..

plz write more...